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Friday, October 28, 2011

अनजान रहस्य















असंख्य पिंड
अनंत प्रसार
अनजान क्षितिज
असह्य प्रहार
अद्भुत जन जन
अद्भुत जीवन
अद्भुत ही तो
है ये संसार
अद्भुत ज्योति
अद्भुत वाचन
अद्भुत लगते
स्वनिर्म विचार
आँचल से ढक सर
अधरों को
दिया गया है
तनिक विस्तार
अम्बर के मोती
आनन् पर
फबते यों
मानो अलंकार
आँगन में खिलतें है प्रतिपल
सुन्दर प्यारे गुल और गुलज़ार
अनूठी किसकी रचना है ये
अदृश्य क्यों वो चित्रकार
अनदेखे हाथों ने उसके
कैसे किया विश्व का आविष्कार?
अबूझ पहेली किसकी ये
किसकी कल्पना का पसार?
क्यों नहीं सामने है वो कण
जो है इन प्राणों का आधार?
क्यों नहीं पता इस बारे में?
क्यों बनता नहीं कोई विचार?
क्यों धरा स्वयं नहीं कह उठती
मैं ही हूँ यह , नहीं कोई और!
 
रचना

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