खड़ा था वह, चुपचाप, शांत, गंभीर,
बड़े ही ध्यान से देख रहा था वह जगह, जहाँ वो खड़ा था धीर वीर,
कुछ ख़ास बात तो थी, शायद तभी तो इतने ध्यान से देख रहा था वो,
सब थे, हाँ सब ही थे मशगूल अपने अपने कामो में,
मन में उसके आशा थी, कोई तो उसकी ओर देखे, कोई तो
किसी को किसी की परवाह नहीं,
किसी को किसी से कोई मतलब नहीं,
पर इसमें अचरज की क्या बात थी?
यह तो रोज़ ही होता था, उसकी किसी से कभी, होती नहीं मुलाकात थी
फिर उसने कुछ सोचा ओर जोर से चिल्लाया,
सब कुछ क्षणों के लिए मुड़े, उस ओर, पर फिर लग गए अपने काम में,
वह फिर से चिल्लाया, रोया, हँसना चाह पर हँस न पाया
क्योंकि दिल के किसी कोने में टीस उठी थी,
अकेलेपन की, उपेक्षा की,
दुःख एक फोड़े की भाँति उभर रहा था, उस कोने में,
आँखें शायद रो रही थी
वह दुखी था, हाँ वह दुखी था
शायद इसलिए की – कभी वह भी इस स्वार्थी सँसार की करोड़ों कठपुतलियों में से एक था,
पर अब नहीं, स्वयं को दिलासा देने के लिए, उसने इस बात पर गर्व महसूस किया,
अब वह नेक था,
और फिर ख़ुशी भी,
जो उसके चारो ओर के ग़मगीन माहौल से मेल नहीं खाती थीं
इसलिए जब इन कुछ क्षणों के विराम के बाद,
वह दिल खोल कर हँसा, तो कोई सह नहीं पाया,
क्या करें वो भी, किसी ओर खुशियाँ सही नहीं जाती थी,
सब ओर से कंकड़, पत्थर, सड़े टमाटर,
उसके फटे बेरंग कुरते तो, ओर रंगीन बनाने लगे,
कुछ लहू के कतरे बहाने लगे,
मैं वहाँ नयी थी, बेखबर थी, की यह रोज़ का कार्यक्रम है,
हर कोई क्रूर है,
सब दुखी है, ख़ुशी एक भ्रम है,
किसी ने मेरी द्रवित आँखे देख,
बड़े प्यार से बतलाया,
उस अजनबी से मेरा परिचय करवाया,
कहा – “आप परेशान न हों,
यह तो इसका रोज़ का काम है,
यह नज़ारा यहाँ आम है,
पागल कहीं का”
और उसने आगे जो कुछ भी कहा,
वो मेरे कानों में पिघले शीशे सा घुसता चला गया,
मैं केवल इतना ही सुन पायी,
पागल कहीं का, पागल
रचना
२६ सितम्बर २००३
Rachna Mam!!!
ReplyDeleteAap likhti bahut gazab hain :)
Thanks Ashish :)
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