दिन भर की शिथिल छाप लिए,
आँखों पर कल के ख्वाब लिए,
मैं रोज़ शाम घर आती हूँ,
मैं यूं कुछ वक़्त बिताती हूँ
दिल में परतों में छुपी हुई,
अधखुले लबों में दबी हुई,
हर बात पे हँसतीं झुंझलाती हूँ,
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ
खिड़की दरवाज़ों के छोरों पर,
थकी बुझी आँखों की कोरों पर,
न पाकर कुछ गुम हो जाती हूँ,
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ
एक सोच काम का साथ है जो,
दिल के पास कोई एक राज़ है जो,
तो ये सोच खुद को बहलाती हूँ,
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ!
