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Friday, October 28, 2011

अनजान रहस्य















असंख्य पिंड
अनंत प्रसार
अनजान क्षितिज
असह्य प्रहार
अद्भुत जन जन
अद्भुत जीवन
अद्भुत ही तो
है ये संसार
अद्भुत ज्योति
अद्भुत वाचन
अद्भुत लगते
स्वनिर्म विचार
आँचल से ढक सर
अधरों को
दिया गया है
तनिक विस्तार
अम्बर के मोती
आनन् पर
फबते यों
मानो अलंकार
आँगन में खिलतें है प्रतिपल
सुन्दर प्यारे गुल और गुलज़ार
अनूठी किसकी रचना है ये
अदृश्य क्यों वो चित्रकार
अनदेखे हाथों ने उसके
कैसे किया विश्व का आविष्कार?
अबूझ पहेली किसकी ये
किसकी कल्पना का पसार?
क्यों नहीं सामने है वो कण
जो है इन प्राणों का आधार?
क्यों नहीं पता इस बारे में?
क्यों बनता नहीं कोई विचार?
क्यों धरा स्वयं नहीं कह उठती
मैं ही हूँ यह , नहीं कोई और!
 
रचना

पागल कहीं का


खड़ा था वह, चुपचाप, शांत, गंभीर,
बड़े ही ध्यान से देख रहा था वह जगह, जहाँ वो खड़ा था धीर वीर,
कुछ ख़ास बात तो थी, शायद तभी तो इतने ध्यान से देख रहा था वो,
सब थे, हाँ सब ही थे मशगूल अपने अपने कामो में,
मन में उसके आशा थी, कोई तो उसकी ओर देखे, कोई तो
किसी को किसी की परवाह नहीं,
किसी को किसी से कोई मतलब नहीं,
पर इसमें अचरज की क्या बात थी?
यह तो रोज़ ही होता था, उसकी किसी से कभी, होती नहीं मुलाकात थी
फिर उसने कुछ सोचा ओर जोर से चिल्लाया,
सब कुछ क्षणों के लिए मुड़े, उस ओर, पर फिर लग गए अपने काम में,
वह फिर से चिल्लाया, रोया, हँसना चाह पर हँस न पाया
क्योंकि दिल के किसी कोने में टीस उठी थी,
अकेलेपन की, उपेक्षा की,
दुःख एक फोड़े की भाँति उभर रहा था, उस कोने में,
आँखें शायद रो रही थी
वह दुखी था, हाँ वह दुखी था
शायद इसलिए की – कभी वह भी इस स्वार्थी सँसार की करोड़ों कठपुतलियों में से एक था,
पर अब नहीं, स्वयं को दिलासा देने के लिए, उसने इस बात पर गर्व महसूस किया,
अब वह नेक था,
और फिर ख़ुशी भी,
जो उसके चारो ओर के ग़मगीन माहौल से मेल नहीं खाती थीं
इसलिए जब इन  कुछ क्षणों के विराम के बाद,
वह दिल खोल कर हँसा, तो कोई सह नहीं पाया,
क्या करें वो भी, किसी ओर खुशियाँ सही नहीं जाती थी,
सब ओर से कंकड़, पत्थर, सड़े  टमाटर,
उसके फटे बेरंग कुरते तो, ओर रंगीन बनाने लगे,
कुछ लहू  के कतरे बहाने लगे,
मैं वहाँ नयी थी, बेखबर थी, की यह रोज़ का कार्यक्रम है,
हर कोई क्रूर है,
सब दुखी है, ख़ुशी एक भ्रम है,
किसी ने मेरी द्रवित आँखे देख,
बड़े प्यार से बतलाया,
उस अजनबी से मेरा परिचय करवाया,
कहा – “आप परेशान न हों,
यह तो इसका रोज़ का काम है,
यह नज़ारा यहाँ आम है,
पागल कहीं का”
और उसने आगे जो कुछ भी कहा,
वो मेरे कानों में पिघले शीशे सा घुसता चला गया,
मैं केवल इतना ही सुन पायी,
पागल कहीं का, पागल

रचना
२६ सितम्बर २००३ 

Halloween Special... A Journey


















A journey full of obstacles,
Hindrances at every path,
No one to show you the way,
No brightness of sun or stars.
Darkness all around,
A deafening sound of silence,
Every creature in its most weird form
As if it has got a haunting license.
A strange but tight grip of fear,
Everyone in despair,
So many evils around
People with dusty eyes, matted hair
Pebbles lying around, some white some black
Some are grey, can’t tell for sure
Lying at every other step
Spiders on them, in most threatening lure
Trees so big,
Forests so dense
All those passing by
Wearing a gesture of seeming so tense
Large crowd of moaning people
Not exchanging a single word
Reptiles creeping over the ground
Even birds looking absurd
Strange though it may seem,
I am able to see a beam
Of a very pure white light
I am enchanted by its very sight
No, I am not describing
Journey to a place after death
It is my dear, journey of life
Full of mysteries around, full of strife
And the sacred light
Symbolizes the beauty of soul
That gives you the power, o mighty man,
To go on, in this world so foul
So, go on, go ahead
Go ahead, on this journey of life,
Full of happiness, yet full of strife!

Rachna
10th September 2004

Wednesday, July 27, 2011

Musing of a wandering heart!

दिन भर की शिथिल छाप लिए,
आँखों पर कल के ख्वाब लिए,
मैं रोज़ शाम घर आती हूँ,
मैं यूं कुछ वक़्त बिताती हूँ

दिल में परतों में छुपी हुई,
अधखुले लबों में दबी हुई,
हर बात पे हँसतीं झुंझलाती हूँ,
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ

खिड़की दरवाज़ों के छोरों पर,
थकी बुझी आँखों की कोरों पर,
न पाकर कुछ गुम हो जाती हूँ,
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ

एक सोच काम का साथ है जो,
दिल के पास कोई एक राज़ है जो,
तो ये सोच खुद को बहलाती हूँ,
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ
मैं यूँ कुछ वक़्त बिताती हूँ!    


 

Saturday, July 16, 2011

You are to me

You are to me,
if space, infinite
if silence, then quiet,
if language then words,
if freedom then birds!

You are to me,
if time then eternity,
if peace then tranquility,
if war then victory,
if nectar then brewery!

You are to me,
the world and its all,
you are to me,
the almighty I call!