क्यों याद तुम्हारी फिर आई
क्यों न पाकर तुम्हे लगा जैसे
खो गयी कहीं मेरी परछाई
क्यों ख्याल तुम्हारा यूँ आया
कुछ अनसुलझे से जालो में
क्यों याद तुम्हारी ले आई
संग अपने शिकवे और आँहे
क्यों सहर ने फैला दी
आगोश में लेने को बाहें
क्यों खता हुई ये अनजानी
क्यों जस्बे दिल के आम हुए
क्यों सच्चे अरमान दिल के
दुनिया भर में बदनाम हुए
क्यों नहीं था सच को मान लिया
क्यों किया था इतना इंतज़ार
क्यों नहीं कहा एक सच सच्चा
जो था.. वो था .. प्यार..
रचना
२६ सितम्बर २००५
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