Tried my hand at hindi and urdu.
This one was written when I was a little low.
But one of the very few which I wrote without thinking about the explanation part.
(As I wrote it urdu :) )
नम चश्म क्यों, क्यों दिल गवाही से इंकार करता है?
सामने है कश्ती भला फिर क्यों भंवर से प्यार करता है?
सैंकड़ो की भीड़ में किसी की नज़र को ढूँढने की आस में,
क्यों ज़माने का तस्सवुर बार बार करता है?
निगाहें झुका कर चल तो दें, हमे फ़िक्र डगर की नहीं,
पर उसे कैसे कहें, वो दिल जो दीवानगी सा ऐतबार करता है?
शौक नहीं है इस जहाँ के बाशिन्दोँ के दीदार का हमें,
पर ऐसे लिहाज़ का क्या फायदा, जो खुद पर वार करता है?
ऐसा भरोसा जो ख्वाहिशें छीन ले, मिटा दे जड़ से आस को,
क्यों ऐसी दीन राह का रुख तू भले इंसान करता है?
वो जो खुदा का इशारा समझा, न किसी और की आरज़ू,
तू ऐसे किसी से दर्द - ए- दिल और ख़ुशी का इज़हार करता है?
खबर नहीं थी की यूँ अधूरे से अंजाम में सिमट से जायेंगे,
अब न एक और कदम, रूह का, दम साथ भरता है!
खुद से न बयां किया कभी, हर वो राज़ अब गैर हो गया,
छोड़ा ऐसे हाल में, कहें क्या?, लफ्ज़ न फासला होठों से पार करता है
कुछ और कहने करने की जान बाकी नहीं अब,
एक साँसों के काफिले के थमने तक, अक्स बस साथ चले,
यही दुआ सहमा हुआ हर सांस करता है......
रचना.
१६ मार्च २००८
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